गणतंत्र दिवस असुविधा २२








प्रकाशन का तिरालीसवॉ वर्ष (जनवरी-जून 2022) 

 गणतंत्र दिवस 2022 

आदिवासी अंक -3 

संपादक - रामनाथ शिवेन्द्र 

गणतंत्र दिवस- 2022 असुविधा,  अक्षर घर, हर्ष नगर राबर्ट्सगंज, सोनभद्र 231216 

‘विस्थापित आदिवासियों को समर्पित जो हमारे लिए शोक-गीत हैं’ 

                                                           अपनी बात 

 असुविधा के प्रकाशन का यह तिरालीसवॉ वर्ष है। आजादी के 73 साल गुजर चुके हैं, हम अपनी हुकूमत में हैं और हमें मालूम है कि हुकूमत हर हाल में हुकूमत होती है, हकूमत की भाषा, संस्कृति, सभ्यता साथ ही साथ अन्य बातें भी अलग होती हैं और हमारा काम होता है हुकूमत की व्यवहार संरूकृति से मेल बिठाना और बतौर नागरिक हम मेल बिठाते भी हैं। हमारी कोशिश होती है कि हुकूमत से मेल बिठाने में किसी प्रकार का गलती न हो जाय और कभी गलती हो भी जाये तो हमें हुकूमत की विनम्रता मिल जाये पर दिक्कत तब होती है जब हमें विनम्रता नहीं मिलती और हमें भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। इस तरह से देखें तो हम सभी के लिए अनिवार्य रूप भगवान का ही सहारा है और हमारी हुकूमतें भी भगवान के सहारे ही हैं तो ये जो हमारे आदिवासी हैं ये बेचारे तो पूरी तरह से भगवान के सहारे हैं ही। असुविधा एक लघु पत्रिका है, इसकी क्षमता नहीं कि आदिवासियों पर पूरा अंक एक साथ निकाल सके इसी लिए इसे कई अंकों में प्रकाशित करना पड़ा। असुविधा का यह तीसरा अंक है। हमारी कोशिश है कि आदिवासियों की सभ्यता, संस्कृति तथा उनकी व्यवहार संस्कृति के बारे में जितना संभव हो सके तथ्यपरक जानकारी दे सके दें। और इस अंक में हमने ऐसा ही प्रयास किया है। प्रस्तुत अंक में हमने देखने का प्रयास किया है आदिवासी से अनुसूचित जनजाति के राजमार्ग पर चलते हुए वे किस हाल में हैं तथा उनका पक्ष क्या है, वे क्या कहना चाहते हैं अपने बारे में तथा आज के समय का हमारा आदिवासी बहुल जो जनपद है वह किस हाल में है इन्हीं विषयों पर तथ्यात्मकता तथा मान्य सन्दभों के साथ चर्चा की गई है। वैसे यह प्रयास आधा- अधूरा ही है जबकि पूरा प्रयास किया जाना चाहिए खुशी की बात है कि लोग प्रयास कर भी रहें हैं असुविधा का यह प्रयास कैसा है इस पर आप सभी विचार करें यही कामना है। असुविधा द्वारा आदिवासियों पर प्रकाशित पिछले अंकों पर पाठकों की प्रतिक्रियायें काफी महत्वपूर्ण रही हैं हम उन्हें धन्यवाद देते हैं जनवरी 2022 

                                                                         (1)

                      आदिवासी से अनुसूचित जनजाति के राजमार्ग पर चलते हुए 

 

आदिवासी कभी आदि ‘वासी’ थे, आज आदि ‘वासी’ नहीं हैं। आज वे अनुसूचित जनजाति हैं, उनकी जाति व संस्कृति का पहले कानूनीकरण किया गया अब राजनीतिकरण किया जा रहा है। कानूनी रूप से उन्हें आदिवासी ही संबोधित किया जाता तो क्या बिगड़ जाता, यही समझने की बात है। आदिवासियों ही नहीं दलितों के साथ भी यह कानूनी ड्रामा लगातार लोकतंत्रा के अभिनव मंच पर खेला गया है। मजा यह कि यह ड्रामा कथित वौद्धिकों को आकर्षित ही नहीं प्रभावित भी कर रहा है।आप थोड़ा समय निकाल कर आदिवासी क्षेत्रों को देख लीजिए कि वे आदिवासी से अनुसूचित जनजाति के राजमार्ग पर चल रहे हैं, रेंग रहे हैं या औंधे पड़े हुए हैं, भहराए हुए हैं, अनाथ, हताश तथा पेट की आग में जल रहे हैं। हमारे अतीत की नियति ही ऐसी थी कि आदिवासी खुद को या तो कथित सभ्यों की संस्कृति में विलीन कर दें या मिट जांए। हमें नहीं भूलना चाहिए आर्यों के कारनामों को, सभ्य होने के गर्व में आर्यों ने भारत के मूल निवासियों को जिन्हें आदिवासी ही कहना चाहिए उनके ही घरों व परिक्षेत्रों से कितना बेहयाई से बेदखल किया था। यह भारत के अतीत का घृणित सत्ता-कौतुक है, किसी दर्दनाक शोक काव्य की तरह। आज के समय का सत्ता-कौतुक तो जो थोड़ी बहुत बची खुची आदिवासियत है, उसे भी लीलने तथा हजम करने के लिए आतुर है। किसे नहीं मालूम कि दुनिया में किसी भी मानव समूह में अगर मानवीय समीपता की आकांक्षांए सुरक्षित हैं, तो वे आदिवासी समाज तथा समूह में ही हैं। आदिवासियों के पास आज भी मानवीय समीपता के सारे प्राकृतिक तत्व जस के तस सुरक्षित तथा आरक्षित हैं। स्त्राी, पुरुष संबधों की बात हो, भाई-चारे, सहभागिता आदि की बात हो, प्रकृति की मादकता में डूब जाने या जंगल के मनोरमों में खुद को विलीन कर देने की बात हो, जड़ी, बूटी के द्वारा रोगों से लड़ने की लोक-विद्या का ज्ञान हो, आज भी ये सारे मानवीय गुण, आदिवासी समूहों में देखे जा सकते हैं, भले ही वे गरीब हैं, बेरोजगार हैं, असहाय हैं तथा उन्हें असभ्य भी कहा जा रहा हो। आज स्थितियां बदल चुकी हैं। अब वे केवल बहस के विषय हैं। जब से औद्यौगिक विकास की पैरवी करने वालों की जन-द्रोही ताकतों का बोल बाला बढ़ा है, तथा सेज आदि के नाम पर भूमि अधिग्रहण कानूनों का क्रूरतम प्रयोग प्रारंभ हुआ है, उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण व्यक्ति वस्तु में परिवर्तित हो गया है। तब से किसान तथा आदिवासी जो बहस के हासिए पर फेंक दिए गये थे, चर्चा परिचर्चा के विषय बन गये हैं। इस लिए नहीं कि उनका हित करना है, इसलिए कि उन्हें और प्रताड़ित करना है। कम से कम भारत में हम ऐसा ही देख रहे हैं कि आदिवासियों एवं किसानों के नाम पर लगातार घड़ियाली आंसू बहाए जा रहे हैं। आजादी के बाद से ले कर आज तक शायद ही कोई ऐसा सत्ता-समूह रहा हो जिसने आदिवासियों के नाम पर आंसू न बहाए हों। देखा-देखी वौद्धिकों ने भी रोना शुरू कर दिया है, हालांकि मैं इसका निन्दक नहीं हूं, मैं मानता हूॅ कि आंसू बहाए जाने चाहिए, कम से कम साहित्य से जुड़े लोगों को तो खासतौर से आदिवासियों के दुखों, यातनाओं, प्रताड़नाओं, विस्थापनों को अपने चिंतन-मनन का विषय बनाना ही चाहिए। खुशी है कि लोग अब ऐसा करने भी लगे हैं, फल-स्वरूप किसान तथा आदिवासियों के जनान्दोलन अब विमर्श का रूप लेने लगे हैं। पर अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है, मैं नहीं जानता कि आदिवासी विमर्श ने कविता संकलनों, उपन्यासों जैसी साहित्यिक विधाओं में अपना उचित स्थान पाया है, लोग इस विमर्श को दूसरी धारा की ओर लगातार मोड़ते, तोड़ते जा रहे है। कहा जाता है कि आदिवासी खुद को बदलना ही नहीं चाहता, वह जड़ होता है, वह संघर्ष-कारी एवं हस्तक्षेप-कारी जन-अभियानों की भागीदारी नहीं कर सकता। ऐसे विचारक अगर जानना चाहें तो आजादी के पहले के समय में उतर कर जान सकते हैं कि जिन आदिवासियों को निरीह, बेवश, हारा हुआ, अपने में गोता लगाने वाला असभ्य माना व जाना जाता रहा है, उन आदिवासियों ने अपनी संस्कृति व सभ्यता बचाने के लिए जिस तरह के जनसंघर्षों को आयोजित किया, वे आज इतिहास के धरोहर हैं। कोल विद्रोह, पहड़िया आन्दोलन, विरसा मुन्डा का आन्दोलन, संथाल व खरवार आन्दोलन आदि कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो सत्ता-धारी वर्ग के निरंकुश अतीत को हिला कर रख देते हैं, तथा चुनौती देते हैं। क्या ऐसे आन्दोलन आदिवासियों के इतर कथित सभ्य जातियों द्वारा किए गये? सत्ता-प्रमुख तो सत्ता-प्रमुख होता है, कानूनों, विधानों, अधिनियमों के आंचल में मुंह छिपा कर शासन करने वाला। उन्हें आदिवासी संस्कृति की जन-हस्तक्षेपकारी भूमिका को नष्ट करने के लिए नये किस्म की धोखापूर्ण रणनीति खोजनी ही थी, उन्होंने ऐसा किया भी। हमारे सोनभद्र में ही जूरा तथा बुद्धू भगत ने वारेनहेस्टिंग्स को हिला कर रख दिया था, ये दोनों भुइयां आदिवासी समूह के प्रतिनिधि थे। राजा बनारस चेत सिंह को विजयगढ़ तथा अगोरी रियासतों से वारेनहेस्टिंग्स बेदखल करना चाहता था। उस समय जूरा तथा बुद्धू भगत ने चेत सिंह का पक्ष लिया तथा तीर-धनुष के साथ अंग्रेजों का मुकाबिला किया। यह अलग बात है कि वारेनहेस्टिंग्स यहां काबिज हो गया पर इन दोनों आदिवासियों के उस सत्ता-प्रतिरोधी संघर्ष को नहीं भूला जा सकता। इन दोनों आदिवासियों ने यह प्रमाणित कर दिया था कि चेत सिंह चाहे जो हों फिर भी वे अपने हैं पर अंग्रेज अपने नहीं हो सकते। विवश हो कर अंग्रेजों को उनसे सम्मान जनक समझौता करना पड़ा था। मजा यह कि जूरा तथा बुद्धू भगत दोनों किसी विश्वविद्यालय के बजाय वे लोकविद्या के उत्पाद थे, जिससे उन्हें अपनों की पहचान का ज्ञान था। विश्वविद्यालयों के उत्पाद वाले लोग तो अंग्रेजों के साथ थे। आदिवासियों के दमन का सिल-सिला पन्द्रहवीं शताब्दी से आज तक लगातार चल रहा है। आदिवासी संस्कृति तथा उनकी भौमिक अधिकारिता नष्ट करने के लिए सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, व सैनिक तौर तरीकों से जो हमले किए जा रहे हैं, उन्हें हर ओर देखा जा सकता है। आदिवासी हैं कि आदिवासी से जनजाति तक के राजमार्ग पर चलते हुए आज भी अपनी संस्कृति व लोक-सभ्यता बचे हुए हैं। वे करमा गा रहे हैं, दारू चुआ रहे हैं, कन्द-मूल की खोज में दिन भर जंगल छान रहे हैं, नर, नारी के मधुर तथा पवित्रा संबधों को बचाए हुए हैं, पत्नी जो उनके लिए सर्वगुण संपन्न नारी है, उनके साथ चल रही है, आपसी संबधों में रंच मात्रा दरार आने तथा संबधों की सात्विक मर्यादा में कमी आने पर, साफ साफ बोलने में वह सभ्यों की तरह संकोच नहीं करती ‘तूं अपना देख’ तूं इस लायक नहीं कि हम तोहरे साथे रहें’ और वह बिना धोखा दिए कहीं दूसरी जगह सलट (विवाह कर) लेती है। अगर नहीं भी सलटती तो वह अपने पति या साथी चयन का अधिकार किसी को सौंपती भी नहीं, क्या नर, नारी के इतने साफ तथा खुले रिश्ते किसी भी समाज में हैं? चाहे मामला साथी चयन का हो, मित्रों के चयन का हो, काम करने का हो, गीत, गाने बजाने, नाचने का हो, हर मोड़ पर आदिवासी नर, नारी, प्रेमी, प्रेमिका अलग अलग रूपों में नहीं दिखते, नर, नारी के सात्विक रिश्तों का आन्तरिक विलयन अगर देखना हो तो कम से कम एक रात आदिवासियों के साथ रह कर गुजारें फिर वहां रिश्तों की मर्यादा देखें। उनके बीच प्रकृति का थिरकना देखें। आप देखेंगे कि उनके यहां जंगल गुन गुना रहा है। यह है लोकविद्या का प्रतिफल जो आदिवासियों को दूसरे ज्ञानार्थियों से अलग करता है। फिर कहना पड़ रहा है कि आज का आदिवासी, आदिवासी है ही नहीं, उसका कानूनीकरण किया जा चुका है, और वह अब जनजाति बनाया जा चुका है। आज हम उनमें छद्म जनजातियता की पहचान कर सकते हैं, इसे जानने के लिए अतीत की ओर लौटना होगा, जब आदिवासियों का सांस्कृतिक व धार्मिक रूपांतरण किया जा रहा था। आदिवासियों का हिन्दूकरण हमारे अतीत का जाना हुआ सच है। भक्ति, पूजा, पाठ, आराधना आदि के आकर्षक माध्यमों से आदिवासी कबीलाई समूहों को हिन्दू धर्म से संस्कारित करने के सांगठनिक प्रयास काफी सफल रहे हैं। मुगलिया काल में सूफी संतांे ने भी उन्हें इस्लाम की तरफ मोड़ने तथा आदिवासियत छोड़ने के लिए प्रेरित किया तथा अंग्रेजी काल में ईसाई पादरियों न भी वही किया जैसा कि दूसरे धर्मावलम्बियों ने किया। गोया उनके ऊपर लगातार सांस्कृतिक व धार्मिक बदलाव के हमले दर हमले किए जाते रहे हैं। कभी ताकत के बल पर, तो कभी प्रलोभनों के बल पर। यहां यह कहना आवश्यक होगा कि आदिवासियों ने खुद भी संस्कृति के बदले हुए रूपों के स्वीकार में अपनी सहमति भी प्रदर्शित की। खासतौर से आदिवासी कबीलों के सरदारों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण भी ऐसा संभव हुआ। कबीलों के सरदारों के सांस्कृतिक व राजनीतिक बदलावों के आत्मसातीकरण एवं सत्ता में बने रहने की आकांक्षाओं के कारण अन्य आदिवासी समूहों ने भी सत्ता-समूह के हसीन रंगों में ढलने का विकल्प स्वीकार किया। ऐसी परिस्थिति में यह अनुमान करना कठिन नहीं होगा कि कितने आदिवासी बच गये होंगे, जिन्होंने सांस्कृतिक व राजनीतिक बदलावों को स्वीकार नहीं किया होगा या विरोध किया होगा। इस संदर्भ में भारतीय इतिहास हमें यही सीख देता है कि आर्यों ने भारत के मूल निवासियों को मैदानी तथा उर्वर क्षेत्रों से खदेड़ कर जंगलों की ओर भगा दिया, जिसे मैं ऐतिहासिक विस्थापन कहता हूं, तथा आदिवासियों के उस गीत को नहीं भूल पाता हूॅ जिसे वे अक्सर गाया करते हैं....कृकृकृ ‘अइसन जनम जग छोड़ि के पहाड़े डेरा हो, के सोए लाल पलंग पर के सोए भुइयां, के सोए कोने में कोदो पुअरा जेठाय के। राजा सोए लाल पलंग पर परजा सोए भुइयां, अइसन जनम जग छोड़ि के पहाड़े डेरा हो।’ सोनभद्र का संदर्भ लें तो यहां का अतीत राजनीतिक परिवर्तनों के कारण हुए आदिवासियत के निर्मूलीकरण का हवाला देता है, पहला है आदिवासी खरवार राजा मदनशाह के साथ चन्देलों द्वारा दिए गये धोखे का। ये वही चन्देल थे पारीमल और बारीमल जो आर्य-संस्कृति में दीक्षित थे, मदनशाह के यहां गुजारे के लिए नौकरी कर रहे थे। बाद में वे छल-छद्म करके अगोरी, बड़हर रियासत के स्वयंभू राजा बन जाते हैं, यह सब होता है बारहवी शताब्दी के आस पास। तब से किसी न किसी प्रकार से आर्य-संस्कृति के लोग ही दोनों रियासतों के राजा बनते आ रहे हैं। अपनी कुटिल संस्कृति का संदर्भ देते हुए पारीमल तथा बारीमल दोनों अगोरी के तत्कालीन राजा मदनशाह को मरता हुआ देखते रहे, वह बिमार था, तथा बेवश था। वह बार बार कह रहा था कि उसके उत्तरराधिकारी को बुलाया जाये, पर उसके उत्तरराधिकारी को पारीमल तथा बारीमल ने अन्त तक नहीं बुलवाया। राजा कराह, कराह कर मर गया। उसका उत्तरराधिकारी युद्ध में हिस्सा लेने के लिए कहीं बाहर गया हुआ था। मरते समय राजा ने रियासत के खजाने की चाभी पारीमल तथा बारीमल को विश्वास-पात्रा समझ कर सौंप दिया, इस आशा के साथ कि उसके निधन के बाद वे उसके उत्तरराधिकारी को चाभी सौंप देंगे। पर वे चाभी काहे सौंपते? खुद राजा बन गये और आदिवासी सामन्तों तथा जनता का दमन करने लगे। खोज-खोज कर मदन शाह के करीबियों की हत्याएं की। (गजेटियार मीरजापुर 1911 पृ...206-207) चन्देलों के डर के कारण कई आदिवासी कबीलों के प्रमुखों ने भी अपनी संस्कृति व सभ्यता छोड़ कर चन्देलों की हिन्दू संस्कृति, धर्म आदि को स्वीकार कर लिया जिनमें प्रमुख रूप से भुइयां तथा कुछ कोल व धांगर सरदार भी थे। उनकी पीढ़ियां आज पूरी तरह से रूपांतरित होकर सवर्ण राजपूत बन गई हैं उनमें आदिवासी संस्कृति का नामोनिशान तक नहीं। पारीमल तथा बारीमल का समय सोनभद्र के आदिवासियों तथा उनकी आदिवासी संस्कृति के निर्मूलीकरण का समय था। आदिवासियत निर्मूलीकरण का दूसरा दौर अंग्रेजी काल में आता है। अंग्रेज भूमि प्रबंधन के कानूनों के जरिए सोनभद्र के आदिवासियों को न केवल भूमिहीन बनाते हैं, वरन् उनके प्राकृतिक गुणों को समाप्त कर आदिवासियों का ‘वन’ (थ्वतमेज) जो उनका जीवन है, छीन लेते हैं। किसे नहीं मालूम कि आदिवासियों का जीवन ही ‘वन’ है या ‘वन’ ही उनका जीवन है। यहां यह बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि आज का सोनभद्र 1988 तक मीरजापुर जनपद का एक भाग था, मीरजापुर 1830 में जनपद का दर्जा पाता है, तथा आगरा टिनेन्सी ऐक्ट अंग्रेज 1926 में पारित करते है।ं 1939 आते आते उ.प्र. टिनेन्सी ऐक्ट भी पारित कर देते हैं। आदिवासी बहुल सोनभद्र के दक्षिणांचल यानि दुद्धी तथा अगोरी को मिला कर एक अलग राज्य जिसे ‘दुद्धी क्राउन इस्टेट’ का नाम दिया गया, कायम कर देते हैं। क्राउन इस्टेट का मतलब इंगलैन्ड की महारानी का राज्य। दुद्धी जा कर मीरजापुर का कलक्टर राजा बन जाया करता था, छत्रा, चंवर-धारी। हमारे सोनभद्र के आदिवासियों की निर्मम गाथा उपरोक्त कानूनों के जरिए निकलती है, जो उन्हें बेघर तथा बिना खेती-बारी के बनाती है। उन्हें वन क्षेत्रों से विस्थापित भी करती है। भूमि अधिकारिता को अंग्रेज मौरुसी तथा कानूनी अधिकार ;ैजंजनजवतल ज्मदंदजद्ध की श्रेणी में रखते थे, जाहिर है आदिवासी मौरुसी जोतदार थे, तथा उन्हें उनकी खानदानी तथा पारंपरिक जोत के आधार पर भूमि अधिकार मिलने चाहिए थे, पर ऐसा नहीं किया गया। पूरे दक्षिणांचल को आगरा टिनेन्सी ऐक्ट के अधीन करके भूमि अधिकारिता के लिए स्टेट्यूटरी प्राविधानों को लागू कर दिया गया। जिसका अर्थ था कि जिसके पास सरकारी ग्रांट होंगे उन्हें ही भूमि अधिकार मिलेगा, नहीं तो नहीं। आदिवासियों के पास सरकारी ग्रंाट नहीं थे, यह अंग्रेजों को मालूम था। फिर यह पूरा परिक्षेत्रा उस दौर में अमापित ;नदेनतअमलमकद्ध था। जमीन के मालिकाने भी अलिखित थे, कब्जे के आधार पर जोत थी। रिकार्ड आफ राइट्स थे ही नहीं, ऐसी स्थिति में गवर्नमेन्ट ग्रंाट आदिवासियों के पास कैसे होते? आदिवासी हितों का नाश करने वाले उन्हीं अंग्रेजी कानूनों को जमीनदारी उन्मूलन अधिनियम का भी आधार बनाया गया। फलस्वरूप आदिवासियों की जोतों की भूमि उनके अधिकारों से छीन ली गई तथा उसे राज्य सरकार या ग्रामसभा में निहित कर लिया गया। आदिवासियों को दूसरी भूमि कौन कहे खुद की जोत वाली भूमि भी नहीं हासिल हो सकी। सारी जमीनें जो आदिवासियों को मिलनी चाहिए थीं, उन पर राज्य या ग्राम सभा का अधिकार स्थापित कर दिया गया। ऐसा अचानक नहीं किया गया था, ऐसा जान बूझ कर तथा नियोजित ढंग से किया गया था। जमीनदारी उन्मूलन अधिनियम का सहारा ले कर जमीनदारी समाप्त करने के नाम पर आदिवासी हितों के विनाश का काम किया गया। 1971 आते आते एकबारगी सोनभद्र में स्थिति राज्य सरकार तथा ग्राम सभा की जमीनों को वन-प्रबंधन के तहत दे दिया गया (देखें माहेश्वर प्रसाद कमेटी की रिपोर्ट व समय समाज और हस्तक्षेप, रामनाथ शिवेन्द्र पृ... 21- 30) कल्पना किया जा सकता है कि अगर ग्रामसभा की जमीनें वन प्रबंधन को नहीं सौंपी गई होती तो आज वे जमीनें, दलितों, पिछड़ों व आदिवासियों के नाम कानूनी रूप से आवंटित होतीं, उन पर फसलें लहरा रही होतीें, जबकि आज तक वन-प्रबंधन उस राजस्व भूमि पर एक पौधा तक नहीं उगा पाया है। जमीन वन-विभाग को जिस हालत में मिली थी आज भी उसी तरह है, अगर इस भूमि को आदिवासियों तथा दलितों में खेती के लिए आवंटित कर दिया जाये तो सोनभद्र की कृषि-उत्पादों की पैदावार में कम से कम बीस प्रतिशत की बढ़ोत्तरी संभव है। यह सच है कि आदिवासी तथा जंगल दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, दोनों एक दूसरे से अपने अपने जीवन जीने की ऊर्जा हासिल करते हैं, इसलिए वनों के वानिकीकरण तथा फैलाव को आदिवासी द्रोही नहीं माना जा सकता पर तब, जब जंगल का फैलाव हो, वानिकीकरण हो, ऐसा कुछ भी सोनभद्र में नहीं हुआ और न हो रहा है। जंगल के फैलाव के नाम पर यहां आदिवासियों की बची खुची जमीनें वन अधिनियम की धारा 4 तथा 20 लगा कर अधिग्रहीत कर ली गईं, तथा उन जमीनों पर बड़े बड़े कारखाने खड़े कर दिए गये, या कारखानों को रियायती शर्तों पर सौंप दिया गया। आज के समय में उन कारखानों की भौमिक संपदा किसी जमीनदार से कम नहीं हैं। सोनभद्र के कारखाने आज सोनभद्र के बड़े जमीनदारों में हैं, वनविभाग तो यहां का आला जमीनदार है ही। ऐसा सब लोकतांत्रिक प्राविधानों के तहत किया गया जो अभिनव किस्म का विस्थापन है, जिसके शिकार हुए हैं यहां के मूलनिवासी, आदिवासी। हमारी सभ्यता को नहीं पता कि प्राकृतिक उपहारों, साधनों, संसाधनों का कारखानों के वैयक्तिक अधिकारों के द्वारा दोहन अमानवीय ही नहीं पूरी मानव जाति के प्रति किया जाने वाला अपराध है, क्योंकि जल, जमीन, जंगल, नदी, पहाड़ प्रकृति के उपहार हैं जिस पर किसी का वैयक्तिक मालिकाना हो ही नहीं सकता। कुछ आदिवासी, दलित तथा पिछड़ों को कारखानों में रोजगार मिला है, जिसका प्रतिशत काफी घृणित है यानि नाम मात्रा है। अगर कोई कारखाने वालों से मांग करे कि हमें उसअनुपात में रोजगार दो जिस अनुपात में हमारे क्षेत्रा की प्राकृतिक संपदा का दोहन कर रहे हो, तो यह राष्ट्रद्रोह हो जाएगा। यह सर्व स्वीकार सत्य है कि अरण्यक संस्कृति तथा नागर संस्कृति के द्वन्द ने पूरी सभ्यता को कई कई खानों में विभाजित किया है, शोषक व शोषित के निर्मम खाने आज भी जस के तस हैं। ये खाने जाने कब तक रहेंगे इस बाबत भविष्य-वाणी भी नहीं की जा सकती। कृषि सभ्यता वाला समाज या यूं कहंे ‘सभै भूमि गोपाल’ वाला समाज, या हल की जोत वाला समाज ( राजाओं के जमाने में हर बालिग व्यक्ति को एक हल की खेती की सीमा तक की जोत वाली जमीन खेती-बारी करने के लिए मिल जाया करती थी ) देखते देखते सामंती समाज में रूपांतरित हो गया तथा इतिहास को पता तक नहीं चला कि हमारे मुखिया कब और कैसे सामंत बन गये। सामंत बनते ही उस वर्ग ने सत्ता के करतबों को दिखाना शुरू किया, उसे करतब दिखाना ही था। मानव समीपता खंड, खंड हो कर टूटने व बिखरने लगी, भाई-चारे की संस्कृति खत्म हो गई, एकला चलो, तथा एकला बढ़ो ने जोर पकड़ लिया, कौन राजा बने, कौन सामंत बने? के लिए हमलों, प्रति हमलों का दौर शुरू हो गया, जिसे शुरू होना ही था। भारतीय मन की आघ्यात्मिक पवित्राता कराहने लगी, यहीं से राज्य तथा व्यक्ति के द्वन्द के रूप में जिसकी लाठी उसकी भैंस की एक निर्मम व समाज द्रोही संस्कृति को सम्मान मिलना प्रारंभ हो गया, जिसे सामंत कहें, राजा कहें, अधिकारी कहें या जन प्रतिनिधि ही। इस तरह एक शक्तिशाली सत्ता समाज अस्तित्व में आया जो आज भी लगभग उसी रूप में हर तरफ फन फैलाए हुए है, भले ही लोकतंत्रा, लोकतंत्रा का जाप कर रहा हो पर है वही, पहले वाला ही। व्यक्ति सत्ता पर इस तरह हाबी हो गया कि समाज हांसिए पर चले जाने के लिए अभिशप्त हो गया। जिसे हम आज भी देख रहे हैं। कहने को तो लोकतंत्रा है पर कहीं भी इसमें लोक नहीं दिख रहा। आंकडों की बात करें तो अचरज होता है कि सोनभद्र आदिवासी बहुल होते हुए भी यहां अनुसूचित जनजातियों की संख्या कुछ सैकड़ा में ही मानी जाती है। यहां के तमाम आदिवासी जातिसमूहों को अनुसूचित जाति के खानों डाल दिया गया है। यह आजादी के बाद वाली प्रान्तीय सरकार की बहुत ही विभत्स चाल थी, जिससे कि सोनभद्र के आदिवासियों को संविधान की अनुसूची पांच का लाभ न मिल सके। वही हुआ भी, यहां के कोल आज भी अनुसूचित जाति के खाने में हैं, गोड़ों को अनुसूचित जनजाति मान तो लिया गया है, पर उन्हें वह रियायतें आज भी हासिल नहीं हो सकी हैं जिनके वे हकदार हैं। दुद्धी तहसील के तमाम गांव जो अनुसूचित जनजाति बहुल हैं, वहां ग्राम पंचायतों में अनुसूचित जनजाति के लिए एक भी सीट आरक्षित नहीं है। अनुसूचित जनजातियों का प्रतिनिधित्व न केवल पंचायती चुनावों से वरन् संसदीय व विधान सभा से भी वंचित है, कम से कम दुद्धी को तो अनुसूचित जनजाति वाला क्षेत्रा मान ही लेना चाहिए, तथा अनुसूचित जनजातियों को उनकी संख्या के अनुसार जन प्रतिनिधित्व प्रदान करने के बारे मे सोचना चाहिए। बिडंबना है कि आदिवासी जो अब अनुसूचित जनजाति में विधिक रूप से रूपांतरित हो चुका है, वह सोनभद्र में रहते हुए क्या करे? वह उन रियायतों को कैसे हासिल करे जिसे देने के लिए सरकारें अपनी प्रतिबद्धतायें दिखा रही हैं। आज तो यह पूरा परिक्षेत्रा अनुसूचित जाति के नाम से ही चल रहा है। इसी आधार पर यहां का एक मात्रा संसदीय सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित भी है, पहले तो दुद्धी तथा रावटर््सगंज की विधान सभा की सीटें भी अनुसूचित जाति के खाते में थीं, कुल मिला कर यहां एक भी सीट ऐसी नहीं जो अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हो। समझा जा सकता है कि यह जो आदिवासियों का हाल के वषों में विधिक रूप से अनुसूचित जनजाति करण हुआ है उससे आदिवासियों को कुछ नहीं मिला, उन्हें किसी सुविधा के लायक नहीं रह रहने दिया गया। विधिक रूप से वे आज के समय में चुनावों में भागीदारी करने के अधिकार से भी वंचित कर दिए गये हैं। सोनभद्र के आदिवासियों के साथ जो कानूनी खेल खेला गया है वह न्यायशास्त्रा के कौतुकों की लोकप्रियता पर सवाल खड़ा करता है, अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो सोनभद्र आज आदिवासी जोन के रूप में जाना जाता जिसे अनुसूची पांच के तहत संविधान ने अनुसूचित किया हुआ है। क्योंकि यह परिक्षेत्रा संविधान के उन सारे उपबंधों को पूरा करता है जो अनुसूचित जनजाति जोन बनाए जाने के लिए आवश्यक हैं। फिर तो सोनभद्र के आदिवासियों की हर संभव सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक स्वायतता बची रह जाती, जैसा कि देश के कुछ हिस्सों में आज भी देखा जा रहा है, जहां संविधान की अनुसूची पांच को लागू किया गया है। सोनभद्र के आदिवासी अनुसूची पांच के लाभों से वंचित हो जांए ऐसा करने के लिए उन्हें आदिवासी न मान कर अनुसूचित जाति माना गया, अनुसूचित जनजाति मानने का तो सवाल ही नहीं था, उनकी आबादी की गणना गलत तरीके से की गई, जानबूझ कर उन्हें अनुसूचित जाति के खाने में रखा गया, जिससे कि इस परिक्षेत्रा को संविधान की अनुसूची पांच के खाते में जाने से रोक दिया जाये। वही हुआ भी, आज यहां का आदिवासी अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में कौन कहे अनुसूचित जाति के खाने में भी नहीं रह गया है। बावजूद इसके सोनभद्र के आदिवासी आज भी करमा की धुनों पर थिरक रहे हैं, सोनभद्र में अगर आपको प्रकृति का नृत्य, संगीत देखना है तो यहां के आदिवासियों के साथ समय गुजारना होगा। उनके साथ रहते हुए ही आप जंगल का लहराना, पेड़ों का मुस्कराना, पत्तियों का मनोरम नाद संगीत व कला सुन व देख सकेंगे, जबकि उनके पास अब खोने के लिए, तथा खाने के लिए कुछ भी नहीं है, वे विस्थापित हैं, बेरोजगार हैं, भूखे हैं, पर जीवन जीने के प्रति आश्वस्त तथा मस्त हैं। जिन्हें भूत भविष्य दोनों भयभीत नहीं कर सकते, दोनों उनके पास अदब से आते हैं और दारू पी कर करमा गाते हुए लौट जाते हैं। अब तो वर्तमान भी उनके पास अदब से हाजिर होने लगा है, वे वर्तमान के प्रति अब काफी सचेत भी हैं, उनकी सचेतनता का परिणाम है दरमा गांव जहां वन प्रबंधन आदिवासियों की पारंपरिक जोत वाली भूमि पर कब्जा नहीं कर पाया, वे दरमा गांव में आज भी कृत संकल्पित हैं कि राजस्व-भूमि को वन-भूमि नहीं बनने देंगे। सोनभद्र में राजस्वभूमि तथा वन-भूमि का द्वन्द अब राजनीतिक द्वन्द बन चुका है। यहां के लोग समझने लगे हैं कि राजस्वभूमि को गैर कानूनी ढंग से वन-विभग को सौंप दिया गया है। आखिर वन-विभाग राजस्व ग्रामों की सीमा के भीतर कैसे घुस सकता है? यह कानून बनाने वालों के लिए सोचने व गुनने की बात है। आदिवासियों की सचेतनता का सोनभद्र में दूसरा उदाहरण है महत्वाकांक्षी कनहर बांध परियोजना, जिसका सचेतन व अहिंसक विरोध आदिवासी कर रहे थे। कनहर बांध के निर्माण को रोकने के लिए वहां के आदिवासी जनतांत्रिक ढंग से बीस वर्षों से संघर्षरत थे, यह सब किसी शिक्षण प्रशिक्षण से नहीं हो रहा था, यह उनके लोक-विद्या की प्रेरणा से हो रहा था। वे जान व मान चुके हैं कि वन उनका है, तथा वे ही वन को बचा भी सकते हैं। आदिवासियों के प्रतिरोध के कारण सरकार उस बांध को नहीं बना पाई थी। किसी तरह अब वह बांध बन रहा है, कुछ वर्षों में बन भी जायेगा। आदिवासियों की शर्तें मान ली गयी हैं। महत्वपूर्ण है कि आदिासियों को राजी किए बिना बॉध का निर्माण संभव नहीं था। आदिवासियों का विरोध था कि बांध का पानी हमें भी दो...यहां के आदिवासी रिहन्द बांध ही नहीं यहां के कारखानों की स्थापनाओं से भी नाराज हैं,कृपहले रोजगार दो, फिर कारखाना बनाओ,अब तो आदिवासी क्षेत्रों में जिसकी जितनी संख्या भारी उतनी उसकी हिस्सेदारी की ललकारें भी सुनाई देने लगी हैं। हालांकि आदिवासी से जनजातिकरण के रास्ते पर चलते हुए आदिवासियों ने अपना बहुत कुछ खो दिया है उसकी भरपाई तो संभव नहीं, पर अभी भी बहुत कुछ शेष है जिसे बचा लेना भी कम महत्व का नहीं होगा। संदर्भ.गजेटियर मीरजापुर 1911, पृ110, 119 

                                                                      (2)

                                                   आदिवासी पक्ष और समय 

आदिवासी कौन हैं, तथा किन्हें आदिवासी कहा जाना चाहिए? इस मुद्दे पर अनेक विचार हो सकते हैं, उन विचारांे तथा चिन्तनों में समानता भी हो आवश्यक नहीं, समानता हो भी सकती है, नहीं भी। आज के समय में आदिवासी विमर्श का विषय है, जिस पर गंभीरता से विमर्श हो भी रहे हैं। विमर्श के कारण हैं, क्योंकि आदिवासियों को उनके क्षेत्रों से विस्थापित किया गया है तथा किया जा रहा है। कभी सेज नगरीकरण के लिए तो बांध या कारखाने के निर्माण के लिए। आदिवासी अपनी पूरी क्षमता के साथ जबरिया विस्थापन का विरोध भी कर रहे हैं, इन्हीं सार्थक व परिणामकारी विरोधों तथा सरकारी अवज्ञाओं के कारण वे विमर्श के विषय बन गये हैं। पर बिडंबना यह है कि आदिवासी आज भी आर्यों की तरह अपरिभाषित हैं। उनकी कोई विधिक पहचान नहीं हैं। आर्यों के बारे में कहा जाता है कि वे विदेशी थे, बाहर कहीं से आये थे, कुछ लोग मानते हैं कि वे देशी थे, वे कहीं बाहर से नहीं आये। आर्य तथा अनार्य दोनों की पहचान झगड़े में है। आदिवासियों के बारे में आम समझ है कि जो आदि से यानि पुराकाल से इस देश के निवासी हैं, वे आदिवासी हैं। आदिवासी का अर्थ भी उनकी पुरातन बसाहट से संदर्भित है, जो आदि-काल से इस देश में बसे हुए हों, उन्हें ही आदिवासी कहा जाना चाहिए। आदिवासियों के बारे में विमर्श का कारण उनकी दशा तथा दिशा है, उन्हें आदिवासी मान लेने के बाद ही विमर्श उपजता है कि आज उनकी आर्थिक संसाधनों में भागीदारी क्यों नहीं है? आखिर उन्हें क्यों उनके अपने कुदरती संसाधनों जिनके वे मालिक हुआ करते थे, से बेदखल कर दिया गया और किया जा रहा है। आदिवासियों के जघन्य विस्थापन के बाद भी निर्लज्ज तरीके से बताया जा रहा है कि उनके कल्याण के लिए कथित सभ्यों की सरकारें बहुत ही चिन्तित हैं। पर ऐसा नहीं दिख रहा। हुकूमतें काल-खंड के झमेलों में किसी भी जातीय पहचान को जस के तस नहीं रहने देतीं। अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें नाम दिया ‘ट्राइब्स’ का, फिर ‘अनुसूचित ट्राइब’ का, इस तरह अंग्रेजी काल में पहले का आदिवासी अनुसूचित जनजाति में रूपांतरित हो गया। ‘मैकाले’ जो अंग्रजों के लिए वौद्धिकता का मास्टर माइन्ड था, उसने भारत की जातीय पहचान को बहुत हद तक गड्ड- मड्ड कर दिया। उसने भारत में निवास करने वाली सभी जातियों की अपने अंग्रेजी प्रबंधन के हितों के अनुरूप व्याख्यायें की, तथा उनमें फेर बदल किया। अंग्रेजों के फेर बदल के शिकार हुए आदिवासी। यह अचानक नहीं था, बल्कि प्रायोजित था। अंग्रेज आदिवासियों की ताकत तथा उनके साहस से परिचित थे, वे जानते थे कि यह जो आदिवासी का गंभीर अर्थ है, ‘आदिम निवासी’ अगर इसे पलटा नहीं गया तो आदिवासी भी अपनी जातीय पहचान की स्थापना के लिए अंग्रेजी हुकूमत से मोर्चा ले सकते हैं तथा मोर्चा लिया भी। अंग्रेज जरलते थे कि आदिवासी ही यहां के सारे प्राकृतिक संसाधनों के कभी मालिक हुआ करते थे। अंग्रेजों की यह सोच हवा में लटकी हुई सोच नहीं थी। अंग्रेज 1857 के बाद से लगातार आदिवासियों की संगठनात्मक सैनिक शक्ति को देख व परख रहे थे। कई आक्रामक मुकाबिलों में अंग्रेजों को भागना भी पड़ा था। सोनभद्र की बात करें तो यहां धांगर जाति के आदिवासी जूरा व बुद्धू भगत ने अंग्रजों की नाक में दम कर रखा था। यहां की रियासत बड़हर व विजयगढ़ पर काबिज हो जाने के बाद भी अंग्रेज अन्य स्थानों की तरह यहां शान्ति पूर्वक हुकूमत नहीं कर पा रहे थे। 1911 के गजेटियर में अंग्रेज जूरा व बुद्धू भगत के बारे में लिखते हैं ;ज्ीमल ूमतम कपमपिमक समंकमते व ि।कपअंेपमेद्ध अंग्रेजों को उस समय की स्थितियों के अनूरूप जूरा व बुद्धू भगत से समझौता करना पड़ा था। समाज की मुख्य-धारा से आदिवासियों को अलग थलग करने के लिए अंग्रेजों ने एक बहुत ही जनविरोधी व्यवस्था किया था, वह था शेड्यूल एरिया का विचार। आज की दुनिया जिस तरह से ‘हटिंग्टन’ महोदय के नागरिक समाज वाले विचार या कांसेप्ट से प्रभावित है, ठीक उसी तरह अंग्रेजों के शेड्यूल एरिया के विचार ने भी दुनिया के वौद्धिक जमीनदारों को प्रभावित ही नहीं, आकर्षित भी किया था। हम जानते हैं कि यह जो ‘नागरिक समाज’ का कांसेप्ट है, वह हटिंग्टन महोदय का है, जो आगे बढ़ कर इतिहास के अंत तथा साहित्य के अंत की कुटिल घोषणा तक पहुंचता है, और सीधे चल कर देरिदा के विखंडन सिद्धान्त ;क्मबवदेजतनबजपवद जीमंतलद्ध को चूम लेता है। कुल मिला कर हम देख सकते हैं की आज की दुनिया नागरिक स्वतंत्राता व मानवाधिकार की कथित पक्षधरता के कारण जितनी हसीन दिखती है, उतनी है नहीं, आज की दुनिया में समानता, स्वतंत्राता तथा मानवाधिकार आदि के नारे, किताबी हितापदेशों से अधिक महत्व नहीं रखते। शेड्यूल एरिया का विचार जिसके जनक अंग्रेज थे वह आदिवासियों के परिक्षेत्रों को सामान्य परिक्षेत्रों से अलग थलग करने का विचार था, जिसका गंभीर प्रयोजन था। प्रयोजन था, आदिवासियों को सामान्यजनों वाले परिक्षेत्रों से अलग करना, भारत के नागर तथा अरण्यक दोनों समाजों को एक नहीं होने देना, इसमें अंग्रेजों को सफलता भी मिली। यह शेड्यूल एरिया का विचार भी एक तरह से आदिवासियों का छल पूर्ण सामाजिक व राजनीतिक विस्थापन ही था। अगर हम सोनभद्र की बात करें, तो हमें 1830 के समय को देखना होगा। 1830 में ही मीरजापुर अलग जनपद का दर्जा पाता है, जनपद बन जाने के तत्काल बाद, कैमूर के दक्षिणांचल वाले परिक्षेत्रा को जिसे अब सोनभद्र जनपद का दर्जा हासिल है, उसे अंग्रेज शेड्यूल परिक्षेत्रा घोषित कर देते हैं। इस तरह से अंग्रेजों ने पहली बार किसी विशेष परिक्षेत्रा को दूसरे परिक्षेत्रा से अलग थलग करने का काम किया जो शुद्ध रूप से संसाधनों की उपयोगिता तथा ग्राह्यता से विस्थापन था। नागरिक समाज का कांसेप्ट भी शेड्यूल एरिया वाला ही कांसेप्ट है, जो अप्रत्यक्ष तरीके से समाज को दो खानों में बांटता है। जो मोटे तौर पर सभ्य तथा असभ्य के हिटलरी खानों का विभाजन है। वही पुराना मनोरोग है ‘व्हाइट मैन्स बर्डेन’ वाला यानि कि हम गोरे हैं तथा हमारा काम है दुनिया के तमाम काले लोगों को सभ्य बनाने का। गांधी जी आदिवासियों को न तो आदिवासी कहते हैं न ही वनवासी, वे साफ साफ आदिवासियों को ‘गिरिजन’ कहते हैं। आदिवासियों के ऐसे नामकरणों के प्रयोजनों पर गंभीर बहसों का सदैव अभाव रहा है जबकि बहस आवश्यक थी और है। अगर बहस हुई होती तो तस्वीर साफ होती आज तो आदिवासियों की तस्वीर ही साफ नहीं है आखिर उन्हें क्या कहना चाहिए? अगर वे ‘गिरजन’ हैं तो सारे जंगली व पहाड़ी क्षेत्रों से जुड़े संसाधनों पर उनकी हिस्सेदारी विधिक रूप से होनी चाहिए। मतलब साफ है अगर आदिवासियों को आदिवासी या ‘गिरिजन’ मान लिया जाता फिर तो अंग्रेज जमीन का, भूमि का परमानेन्ट सेटलमेन्ट ही न कर पाते। अगर करते भी तो आदिवासी आज अन्य सवर्ण जातियों की तरह भूमि संसाधन का संरक्षक होता, क्योंकि वे उस पर पुराकाल से ही काबिज होते हुए अंग्रेजों के समय में भी काबिज थे, तथा मुगलों व राजपूतों के काल में भी काबिज थे ही। अगर अंग्रेज आदिवासियों को अदिवासी मान लेते फिर तो वे अपने सत्ता समर्थकों के अधिकारों को स्थापित नहीं कर पाते। जबकि अंग्रेजों को हर हाल में आदिवासियों को प्राकृतिक संसाधनों से अलग थलग करना था। उनसे उनके स्वमित्व तथा सरंक्षकत्व को छीनना था। यह अविवादित सच है कि अंग्रेजों ने भारत में उन्हीं लोगों को सत्ता संबधों तथा संसाधनों में हिस्सेदारी से जोड़ा जो उनके अन्ध दलाल व आज्ञाकारी थे। अपने आज्ञाकारियों को डराने के लिए अंग्रेजों ने एक और सिगूफा छोड़ा था, जो देशी तथा बाहरी का था। अपने समर्थक आर्यों (जो अंग्रेजों के काल में आदिवासियों का दमन करके कथित रूप से सभ्य यानि कि संसाधनों के मालिक बन चुके थे) को अंग्रेजों ने अपनी तरह से बाहरी प्रमाणित किया था तथा उन्हें डराया था कि अंग्रेजों को वे बाहरी समझने की गलती न करें, क्योंकि वे भी यहां के आदिवासी (मूल निवासी) नहीं हैं, बाहरी हैं। अंग्रेजों को पता था कि भारत में बसने वाले अपनी बसाहट के आधार पर कभी भी देशी तथा विदेशी का सवाल खड़ा करके उन्हें भारत से बेदखल कर सकते हैं। अंग्रेजों को भारत में बसाहट को ले कर वैचारिक मतभिन्नता स्थापित करने में सफलता मिली कि यहां जो भी सत्ताधारी है, वह बाहरी है। तथा किसी न किसी तरह आदिवासियों का दमन करके ही यहां स्थापित है। गांधी जी आदिवासियों को सभ्यता-मूलक कारणों के आधार पर गिरिजन कहते हैं, तथा आदिवासियों को लेकर बसाहट पर सवाल नहीं करते। वे मानते हैं कि जो भारत में बसे हुए हैं, वे सिर्फ और सिर्फ भारतीय हैं। ऐसे लोग जो पहाड़ों तथा जंगलों में निवास करते हैं, और जो प्रकृति के सहारे जीवन जीने की ऊर्जा हासिल करते हैं। वन ही जिनका जीवन है। उन्हें गिरिजन संबोधित करके एक तरह से गांधी जी स्थापित करते हैं कि यही भारतीय समाज है, जो प्रकृति को जीवन की सुरक्षा मानता है। वह समाज कुदरती संसाधनों व प्राकृतिक उपहारों को सुरक्षित रखता है। इसी समाज से मिलता-जुलता दलितांे का समाज है, वह तो सीधे सीधे ‘हरिजन’ हैं ही, यानि परमात्मा का जन, पूरी तरह कुदरती, किसी कानून या किसी सामाजिक व्यवस्था का उत्पादन नहीं। हरिजन तथा गिरिजन दोनों ही गांधी के समय में भी केवल सभ्यता से ही नहीं, राजनीतिक,सामाजिक,आर्थिक व प्रशासनिक व्यवस्थाओं से पीड़ित लोग थे। आज भी वही स्थिति है। जिन्हंे अछूत बना दिया गया था, उनके लिए स्कूल तक नहीं थे, प्रकृति के संसाधनों में हिस्सेदारी का तो सवाल ही नहीं था। सारे संसाधन कथित सभ्यों के नियंत्राण तथा अधिकार में थे। एक तरह से मानव सभ्यता की परिभाषा प्राकृतिक संसाधनों तथा सत्ता में हिस्सेदारी से गढ़ी जा रही थी। वैसा ही आज भी देखा जा रहा है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि अछूत एक साधरण अर्थबोध वाला शब्द भर नहीं है, ऐसे लोग जिन्हें छूआ नहीं जाना चाहिए और न ही उनसे छुआना चाहिए, उन्हें अछूत कहा जाता था। अछूत का केवल इतना ही अर्थ नहीं था, उसका अर्थ था कि यह जो मानव निर्मित सामाजिक, आर्थिक, कानूनी कथित सभ्यता मूलक व्यवस्थांए हैं, इन सारी व्यवस्थाओं से उन्हें असभ्य और अछूत बनाकर साफ साफ अलग कर देना है, सत्ता-प्रबंधन के जुड़ावों सेे उन्हें खारिज कर देना है, तथा बेहया तरीके से हीन-भावना का मनोरोगी भी उन्हें बना देना है। ऐसा हुआ भी। सामाजिक संरचना के खिलाड़ियों को इस काम में सफलताएं मिली तथा आदिवासियों एवं हरिजनों दोनों को हीन-भावना का शिकार बना दिया गया। उनसे सारे प्राकृतिक संसाधन छीन लिए गये तथा धार्मिक हितोपदेशों के माध्यम से समझाया गया कि यह सब परमात्मा की लीला है, तभी तो हमारे सोनभद्र में आदिवासी दर्द भरा एक गीत गाते हैं.....कृकृ ‘अइसन जनम जग छोड़ि के पहाड़े डेरा हो, या हमनी कऽ जनम बेकार हो विधि करमा’ वे अपनी यातनाओं, प्रताड़नाओं तथा विस्थापनों का कारण करम बाबा को मानते हैं, वे जीवन जीने के दूसरे अनुशासनों की समीक्षा जानते तक नहीं। सारा खेल करम बाबा का है, वे ही किसी को बनाते हैं या बिगाड़ते हैं। यह जो हमारा बिगाड़ है, यानि दलित हैं, शोषित गरीब, प्रताडित हैं, किसी वर्ग विशेष द्वारा किया गया बिगाड़ नहीं है, बल्कि परमात्मा की लीला का परिणाम है। अगर हम गंभीरता से देखना चाहें तो साफ साफ दिखेगा कि यह जो आदिवासियों का समाजिक, सत्तात्मक तथा संसाधनों में हिस्सेदारी से जघन्य विस्थापन का मामला है, उसे सत्ता स्थापना के लिए विस्थापन ही कहा जाना चाहिए। वह आदिम है तथा पुराने काल से ही चला आ रहा है। पहला विस्थापन हम आर्यों तथा अनार्यों के सत्ता संघर्षों के निहित स्वार्थों, सत्ता स्थापनाओं एवं आदिवासियों के आर्यीकरण में देख सकते हैं। उसके बाद बौद्धकाल में बौद्धीकरण, राजपूत काल में राजपूतीकरण तथा मुगल काल में इस्लामीकरण से होते हुए अंग्रेजी काल के इशाईकरण में देख सकते हैं। आदिवासियों के पहले वाले विस्थापन संसाधनों में भागीदारी एवं सत्ता स्थापना के लिए हुआ करते थे। जाहिर है सारा जंगली परिक्षेत्रा आदिवासियों के अधीन हुआ करते थे। वे उसके मालिक हुआ करते थे। आदिवासियों का अपने परिक्षेत्रा में पवित्रा तथा शुचिता-पूर्ण जन-सहभागी प्रबंधन हुआ करता था। आदिवासियों का मुखिया वस्तुतः मुख की तरह हुआ करता था, ‘मुखिया मुख सों चाहिए, खान,पान को एक’ वाला। वह राजाओं की तरह क्षत्रा-चंवर धारी शासक नहीं होता था। वह अपने समाज का संरक्षक हुआ करता था। सबसे बड़ी बात थी कि आदिवासियों का भूमि-प्रबंधन बहुत ही शुचितापूर्ण था, यानि जो अपने हल-बैल से खेती कर सकता था तथा धरती की मर्यादा बचा सकता था, उसी को खेती करने के लिए जमीन दी जाती थी। मुगलकाल में जमीन का प्रबंधन राजस्व आधारित हो गया, कहीं उत्पादन के चौथ की परंपरा थी तो कहीं उत्पादन के दशवें हिस्से की। अंग्रेजी-काल में सारा कुछ उनके द्वारा बनाए गए राजस्व अधिनियमों के तहत लिखा पढ़ी में होने लगा। अप्रत्यक्ष रूप से जमीन का पूंजी में रूपान्तरण कर दिया गया। उसे पूंजी बना दिया गया। पूंजी का मतलब जिसे बेचा व खरीदा जा सके। अंग्रेजों ने भूमि को बेचने तथा खरीदने के काम को विधिक बना दिया। यह जो जमीन पर या प्रकृति के दूसरे संसाधनों पर, मालिकाना स्थापित कराने का काम है, प्रकृति का जबरिया अधिग्रहण है, तथा कुछ लोगों को विशेषाधिकारों से संवार कर दैवीय बनाने का काम है यह सारा काम सत्ता को प्रमाणित करले के लिए है कि ‘किंग इज गाड’ और राजा कभी गलत कर ही नहीं सकता और सत्ता राजा की प्रतिनिधि हुआ करती हैं। अंग्रेजी काल में सोनभद्र में अंग्रेजों के दो कानून प्रभावी थे पहला था आगरा टिनेन्सी ऐक्ट, दूसरा था युनाइटेड प्राविन्सेज रेवेन्यू ऐक्ट। आगरा टिनेन्सी ऐक्ट में भूमि-जोतकों को स्टेट्यूटरी टिनेन्ट माना जाता था यानि सरकारी ग्रांट मिलने पर ही कोई जमीन जोत सकता था, जो कभी मिलता ही नहीं था। जबकि युनाइटेड प्राविन्सेज रेवेन्यू ऐक्ट में भूमि जोतक अपने पारंपरिक कब्जे के आधर पर मौरूसी जोतदार मान लिया जाता था। इस आलेख में कानून के अंतर को बताना इसलिए आवश्यक है कि जमीन-प्रबंधन की अंग्रेजी चालों व अपनी देशी सत्ता की कुटिल चालों को साफ साफ समझा जा सके। हमारे सोनभद्र में उपरोक्त दोनों ऐक्ट लागू थे। यहां की रावटर््सगंज तहसील में युनाइटेड प्राविन्सेज रेवेन्यू ऐक्ट लागू था तो दुद्धी तहसील में आगरा टिनेन्सी ऐक्ट लागू था। हमारे सोनभद्र जनपद का दक्षिणांचल अगोरी तथा दुद्धी परिक्षेत्रा यानि दुद्धी तहसील टिनेन्सी ऐक्ट से बुरी तरह प्रताड़ित हुआ क्योंकि उस परिक्षेत्रा में किसी को मौरूसी नहीं माना गया, परिणाम यह हुआ कि वहां रहने वाले जो भी गरीब आदिवासी, दलित तथा पिछड़ी जाति के लोग थे, और पारंपरिक ढंग से खेती किया करते थे उन्हें जमीनदारी उन्मूलन अधिनयिम का लाभ नहीं मिला और वे अपनी जोत की जमीनों से बेरहमी के साथ बेदखल कर दिए गये। जमीनदारी उन्मूलन अधिनियम के तहत जमीन उन्हें ही मिल सकती थी जिनके पास जमीन के मालिकाना के या तो रिकार्ड आफ राइट्स हों या वे मौरुसी काष्तकार हों। बिडंबना थी कि दुद्धी परिक्षेत्रा अनसर्वेड एरिया था, वहां रिकार्ड आफ राइट्स कभी तैयार ही नहीं कराए गये थे सो वहां आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों को जमीन आवंटित न करके सारी जमीनों को वन प्रबंधन में दे दिया गया। आज हमारे जनपद में वन-प्रबंधन सत्तावन प्रतिशत जमीन का जमीनदार है तथा पुराने जमीनदारों व सामन्तों से अधिक क्रूर भी। वन के बाद यहां के बड़े जमीनदारों में दसियों कारखाने हैं जिन्हें जनता के विकास के लिए आदिवासियों को बेदखल करके स्थापित कराया गया है। जबकि उन कारखानों में आदिवासी कौन कहे सभी जातियों, उप जातियों को जोड़ कर सोनभद्र के एक प्रतिशत लोगों को भी रोजगार नहीं दिया जा सका है और न ही कभी दिया जाएगा। लगता है आजादी मिल जाने के बाद, पं. गोवन्द बल्लभ पंत (उ.प्र. के प्रथम मुख्यमंत्राी) अपने संकल्पों को भूल गए थे, उन्होंने मान लिया था कि जमीनदारी तोड़ कर भूमिप्रबंधन का सारा काम निपटा लिया गया है, पर सारा काम निपटा नहीं था। जमीनदारी तोड़ने का पवित्रा लक्ष्य था कि अधिक से अधिक जोतों को निर्मित करना तथा जमीन जोतकों को जमीन पर कानूनी अधिकार देना पर ऐसा हो नहीं पाया। किसी न किसी तरह से अंग्रेजी प्रभु वर्ग के लोगों ने अपनी जमीनें बचा लीं, जिसे आदिवासियों से छीना गया था, हड़पा गया था। यहां जमीन तथा संसाधनों का मालिक एवं सत्ता का सहभागी वही वर्ग है जिसे अंग्रेजों ने भूमि के परमानेन्ट सेटलमेन्ट के द्वारा कानूनी रूप से मालिक बना दिया था। जो कभी जमीन का जोतक नहीं था उसे ही इन्टरमीडियरी बनाया गया, यानि सरकार और जनता के बीच दलाली करने वाला वर्ग, वही वर्ग आज के समय का मध्यवर्ग है। कुछ उसी तरह से ही जमीनदारी उन्मूलन की प्रक्रियाओं में भी हुआ। अंग्रेजों ने जमीन बन्दोबस्ती को कागजी सबूतों का खेल बना दिया था, यानि रिकार्ड आफ राइट जिसके पास होगा जमीन उसी को मिलेगी। जरा सोचिए भारत में कितने परिक्षेत्रों में उस जमाने में रिकार्ड आफ राइट्स तैयार कराये जाते रहे होंगे? भारत में तो जमीनों का मालिकाना जमीन के कब्जों तथा जोतों के आधार पर परिभाषित हुआ करता था। क्योंकि हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था ‘हल की जोत’ के वसूल पर टिकी थी, माना जाता था कि हर बालिग के पास एक हल की जोत की जमीन होनी चाहिए। इस वसूल के तहत हर बालिग जिसे जीवन यापन के लिए खेती करना होता था, वह जंगल काट कर, जमीन समतल कर, एक हल की जोत की जमीन खेती लायक बना लिया करता था। अंग्रेजों ने हल की जोत की व्यवस्था को खरिज कर दिया। आदिवासियों के पास रिकार्ड आफ राइट्स नहीं थे, सो अंग्रेजों ने उनकी जोत की जमीनों से उन्हें बेदखल कर दिया। इतना ही नहीं हमारे सोनभद्र के आदिवासी बहुल परिक्षेत्रा दुद्वी को विक्टोरिया इस्टेट बना लिया। अंग्रेज कलक्टर दुद्वी का राजा हुआ करता था तथा वहां का सारा राजस्व तत्कालीन अंग्रेज सम्राट या रानी को जाया करता था। आजादी मिलने के बाद जमीनदारी तोड़ी गई, हमारे जनपद का दक्षिणांचल उस समय अनसर्वेड था, जाहिर है यहां किसी के पास रिकार्ड आफ राइट्स नहीं थे, फलस्वरूप जमीनदारी विनाश अधिनियम के तहत इस परिक्षेत्रा के भूमि-जोतकों को वह जमीन भी कानूनी रूप से नहीं मिल पाई जिस पर वे पारंपरिक रूप से काबिज चले आ रहे थे। जमीनें उन्हें ही मिल पाईं जिन्हें अंग्रेजों ने इन्टरमीडियरी या सुपुर्दगार बनाया हुआ था। बाकियों को जमीन पर अधिकार नहीं मिले। आदिवासियों के संदर्भ में एक न्यायायिक फैसला देखना असंगत नहीं होगा। यहां के एक बड़े राजा ने अपनी जमीनदारी उन्मूलन के विरूद्ध उ.प्र. सरकार के निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती प्रस्तुत कर दिया कि उसकी जमीनदारी उन्मूलित नहीं की जा सकती। न्यायालय ने राजा की जमीनदारी उन्मूलन की सरकारी प्रक्रियाओं पर रोक लगा दिया। कुछ साल बाद हाईकोर्ट का फैसला आया जो आधा राजा के हित में था तो आधा उ.प्र.सरकार के हित में था। जिसका अर्थ था कि राजा को जो जमीन खोंइछा में या अंग्रेजों ने अपनी सेवाओं के बदले ग्रांट में दिया था, उसे जमीनदारी उन्मूलन की प्रक्रियाओं से बाहर किया जाता है। हाईकोर्ट का यह फैसला सुप्रीमकोर्ट रद्द कर देता है, तथा व्यवस्था देता है कि ‘कृषि विकास आवश्यक है इसलिए जमीनदारी उन्मूलन को नहीं रोका जा सकता’। दुखद है कि जमीनदारी उन्मूलन का मामला अदालत में जाने के बाद प्रान्तीय सरकार ने उसे स्थगित कर दिया था, बाद में उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद जमीनदारी विनाश की कार्यवाहियां की गईं पर जमीनदारी विनाश की सबसे महत्व पूर्ण धारा 117 को पहले की तरह ही स्थगित रहने दिया गया, उसे लागू ही नहीं किया गया जो आज तक स्थगित है जिसका परिणाम हुआ कि अगोरी तथा दुद्धी परिक्षेत्रा की सारी ग्रामसभाओं में भूमि प्रबंधक समितियों का गठन नहीं कराया गया जो असंवैधानिक है। इतना ही नहीं उस परिक्षेत्रा की सारी ऐसी भूमि जिसे ग्राम-सभा में निहित होना चाहिए था और अंग्रेजों के समय में भी वे जमीनंे ग्राम-सभा या पंचायत में निहित थीं उसे भी वन-विभाग को सौंप दिया गया क्योंकि उन क्षेत्रों में भूमि-प्रबंधन समितियों का ग्राम-पंचायत वार गठन ही नहीं किया गया यानि कि वहां से जमीनदारी विनाश अधिनियम की धारा 117 को शिथिल कर दिया गया। जमीनदारी विनाश अधिनियम का खास प्रयोजन था कि जोत के बाहर की सारी जमीनों को ग्राम-सभा में निहित करना तथा ग्रामसभा के आधार पर उन जमीनों का प्रबंधन करना जिसके लिए धारा 117 को विहित किया गया था पर उसे भी सम्मानित नहीं किया गया। इस प्रकार का जहां कानूनों का खेल चल रहा हो, आदिवासी किस हाल में होगा चाहे सवाल उनकीअस्मिता का हो, या संसाधनों में उनकी भागीदारी का, हम अनुमान लगा सकते हैं। उस परिक्षेत्रा से ज.वि.अ. की धारा 117 समाप्त कर दिए जाने के कारण प्रशासन ने ग्राम-सभा में निहित की जाने वाली सारी जमीनों को वन-प्रबंधन में सौप दिया और आज वन-प्रबंधन खुद को उन जमीनों का मालिक समझता है। लगता है आज का समय आदिवासियों का पक्ष ही नहीं देख रहा। वन क्षेत्रा के बाहर की सारी जमीनें जिन पर ग्राम-सभाओं का अधिकार था तथा जो आदिवासियों के जोत-कोड़ में पुश्तैनी तरीके से थीं उन पर वन-प्रबंधन ने वन-अधिनियम की धारा 4 और 20 लगाकर आदिवासियों को बेदखल कर दिया। यानि कि आदिवासियों का सारा कुछ काले कानूनों के जरिए छीन लिया गया। अब तो यही कहा जाना चाहिए कि आज के समय में आदिवासियों कों अपना पक्ष कुछ है ही नहीं। संदर्भ- 1-गजेटियर मीरजापुर पृ...153, 165, 167 2-सर्वे सेटलमेन्टक -1841 3-रिपोर्ट माहेश्वर प्रसाद कमेटी, दिनांक-23/12/1983 सरकार की विज्ञप्ति संख्याकृ9407/चौदह-1953 दिनांक 18/06/1958 के द्वरा आदेशित किया गया कि कैमूर के दक्षिणांचल में ग्रामसभाओं को भूमि-प्रबंधक समिति के अधीन ज.वि.अधिनियम की धारा 117 को बहाल कर दिया गया है। बिडंबना यह है कि आज तक उस परिक्षेत्रामें भूमि प्रबंधक समिति का गठन नहीं कराया जा सका है पहले जैसा ही स्थगित है। भूमिप्रबंधक समिति कब बहाल होगी कुछ कहा नहीं जा सकता। 4.writ petition (cri) no.1061 of 1982 November 20, 1986, Banvasi Seva Ashram vs Srate of U.P. from revenue decision. R.D.1988, page 68-72 5.State of U.P. & others, Civil Appeals Nos. 653 to 655 of 1964, September 16, 1966. 

                                                                        (3)

                                          आज के समय का एक आदिवासी जनपद सोनभद्र 

 

सामाजिक तौर पर जनजाति बहुल जनपद है पर कानूनी तौर पर नहीं। आज यह जनपद अनुसूचित जाति बहुल है। इस जनपद की आधुनिक समय में जैसी तस्वीर है वैसी आजादी के पहले नहीं थी। किसी समय यह जनपद आदिवासी जनपद हुआ करता था जिसे अंग्रेज अनुसूचित क्षेत्रा के रूप में पहचानते थे। उस समय अंग्रेजों ने इस परिक्षेत्रा के लिए विशेष किस्म के कानून भी बनाए हुए थे। यहां पर आदिवासियों की तीन रियासतें थीं जिन्हें विजयगढ़, अगोरी-बड़हर तथा सिंगरौली के नाम से जाना जाता था पर आज उन रियासतों का नाम चन्देल राजाओं के नाम से जाना जाता है। कोई नहीं जानता कि यहां का राजा कभी मदनशाह नाम का आदिवासी था। आज हमें इस आदिवासी जनपद में जो आदिवासी मिलेगा वह या तो विस्थापित होगा या तो प्रताड़ित। दूसरे किस्म के जो आदिवासी मिलेंगे, वे करमा गाते हुए मिलेंगे, जिनके चेहरे मुर्झाए होंगे। जिनके गालों की झुर्रियां कोई शोकगीत गा रही होंगी तथा अपनी मजबूरी पर ऑसू बहा रहे होंगे। यह सोनभद्र का ऐतिहासिक सत्य है, हम इस सत्य की कल्पना कर सकते हैं, शायद ऐसा ही हमें करना भी चाहिए। हम इस सोनभद्र को चाहें तो चन्द्रकांता संतति सीरियल की चन्द्रकांता के सौन्दर्य से भी जोड़ सकते हैं पर ऐसा नहीं है। इस परिक्षेत्रा से चन्द्रकांता का दूर से भी लेना देना नहीं, उसका नाम देवकी नंदन जी की कल्पना से जुड़ा था। सच यह है कि यह परिक्षेत्रा पहले आदिवासी राज के रूप में था जिसे राजपूतों ने बारहवीं शताब्दी में आदिवासियों से छीन लिया था। अतीत के साथ किसी भी प्रकार की छेड़-छाड़ करना, उसे बदलने के लिए उससे बदला लेने का प्रयास करना, भले ही अच्छी नियति हो, फिर भी उचित नहीं माना जा सकता। माना जाता है कि ऐसे प्रयास विनाशकारी अधिक, लाभदायक कम होते हैं या लाभदायक होते ही नहीं। पर सवाल है कि अतीत से छेड़-छाड़ किये बिना, क्या हम मौजूदा सोनभद्र की या कहीं की कोई तस्वीर बना सकते हैं तथा उसमें मन माफिक रंग भर सकते हैं? तस्वीर बना लेने के बाद, क्या यह संभव है कि हम कह सकंे कि यही सोनभद्र की तस्वीर है, उस तस्वीर को लेकर उन सभ्य लोगों को दिखायंे जो औद्योगिक प्रगति को किसी भी क्षेत्रा की प्रगति का नमूना मानते हैं। उन्हीं की तरह हम भी चिल्लायें ‘देखो हमारा सोनभद्र विकसित हो चुका है, यहां तुम्हें विज्ञान के अद्भुत कौशल हर ओर मिलेंगे, हमारे यहॉ चिमनियॉ हैं, तेरे पास क्या है?’। वैसे किसी भी परिक्षेत्रा को जानने के लिए विज्ञान के कौशलों द्वारा बनाये गये तस्वीरों को हर तरफ प्राथमिकता मिलती है, माना जाता है कि विज्ञान झूठ नहीं बोलता। पर आप जानते हैं कि असल तस्वीर तो पेट और मन की नैसर्गिक चेतना से बनायी जाती है। पेट के लिए रोटी चाहिए और मन के लिए शान्ति, इन दोनों के लिए क्या विज्ञान के पास कोई कौशल है? या विज्ञान ने इनके लिए कुछ किया है? मैं समझता हूॅ हम सभी के पास पेट और मन तक की पहुंच के लिए विज्ञान किसी भी प्रकार का साधन, संसाधन नहीं जुटा सकता, ऐसा करना उसकी क्षमता में भी नहीं, विज्ञान का ऐसा लक्ष्य भी नहीं। हमें रोटी चाहिए, इस बाबत विज्ञान हमें क्या दे सकता है? कहा गया था कि बड़ी बड़ी चिमनियां हमारे पेट की आग ठंडा कर देंगी पर हुआ क्या? आग तो जैसी लगी थी वैसी ही लगी हुई है, मन भी उसी हाल में हैं, खिन्न तथा उद्विग्न। आवाजें उठ रही हैं कि सिवाय परमात्मा के हमारा कोई सहारा नहीं, यह जीवन हमारे लिए नहीं, हमें अपने जीवन को विकसित एवं सभ्य बनाने की कला नहीं आती, तो क्या हुआ? आत्महत्या करने के लिए तो पढ़ाई लिखाई की आवश्यकता नहीं। देखने में आ रहा है कि जीवन जीने की सतत् एवं पवित्रा आकांक्षायें हमारे समाज में काफी कमजोर हो रही हैं, हर ओर निराशा एवं हताशा के घातक कोहरे फैल चुके हैं। सोनभद्र के कम से कम साठ प्रतिशत से अधिक आदिवासियों, वनवासियों के चेहरों पर लिखी हुई हताशा, निराशा एवं उदासी की लिपियां, पढ़ना चाहें तो पढ़ सकते हैं, तथा गुन सकते हैं कि हम किधर जा रहे हैं? और हमें जाना किधर था। सोनभद्र हो चाहे कोई दूसरी जगह, उसकी तस्वीर बनाने के लिए हम कई मूलभूत आधारों का सहारा लेना चाहें तो ले सकते हैं। आधारों के चुनाव के लिए भी वुद्धि का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं, वे पहले से ही सभ्य-जनों द्वारा बनाए हुए हैं। आधारों के बारे में साफ साफ बताया व समझाया गया है कि औद्योगिक इकाइयों की स्थापनायें तथा प्रकृति का अधिकतम दोहन ही वह आधार है, जो पूरी मानव सभ्यता को हसीन मुस्कराहटों से भर सकता है। सारी दुनिया में इस जघन्य झूठ के नगाड़े पीटे गये और आज भी पीटे जा रहे हैं। समझाया गया कि समाज को चाहिए क्या? एक घर, बच्चे, और पत्नी यानि व्यक्ति की सोच की अधिकतम सीमा। घर की चाहरदिवारी में कैद उसके सुख दुख, इसके बाहर की जो विशाल दुनिया है, उससे उसका कुछ भी लेना-देना नहीं, और यह सब तभी संभव हो सकेगा या बनाया जा सकेगा, जब औद्योगिक प्रगति को अधिकतम गति प्रदान किया जाएगा। पश्चिम की कथित औद्योगिक प्रगति की मृग-मरीचिका में सारी दुनिया फंस ही नहीं गयी, बुरी तरह से उलझ भी गयी है। एकांगी धारा की इस वैज्ञानिक सोच ने भी इसी आरोपित सोच को मान्यता प्रदान किया। फलस्वरूप प्रकृति का क्रूरतम दोहन सारी दुनिया में प्रारंभ हो गया। प्रकृति का दोहन इतना आसान नहीं था पर मानवीय वुद्वि के कौशल ने वह कर दिखाया, जिसकी कल्पना तक नहीं की गयी थी। सोनभद्र में अपने चारो ओर हम देख रहे हैं कि विशालकाय चिमनियां मुस्करा रही हैं, और उसके कारण विस्थापित हुए लाखों लोग कटोरा लिए करमा गा रहे हैं, जो कभी यहां के मालिक हुआ करते थे। औद्योगीकरण का एक अर्थ भारी मशीनीकरण तथा उसका आटोमाइजेशन (स्वचालन) भी है। सामान्य अर्थों में हर वह काम जिसे मानव-श्रम से कराया जाना वहुसंख्यक आबादी वाले समाज के लिए अनिवार्य रूप से अनिवार्य है, उसे भी कथित विकास के नाम पर मशीनों के द्वारा कराया जाने लगा। इसका दूसरा अर्थ हुआ मानव-श्रम योग्य हर कामों को मशीनांे के द्वारा कराया जाना जैसे वे सारे काम आदमी कर ही नहीं सकते। सवाल यह नहीं है कि मशीनों की उपयोगिता नहीं है, सवाल है, आदमी के बदले मशीनें क्यों? आखिर मानवश्रम को मशीनंे कैसे खारिज कर सकती हैं। वह भी तब जब हमारे समाज में भयंकर बेरोजगारी हो। हम अमेरिका या रूस की नकल नहीं कर सकते, वहां की आबादी का घनत्व, वहां की भूमि संपदा की तुलना में बहुत ही कम है। हमारे यहां आबादी का घनत्व प्रति वर्ग किलोमीटर तीन सौ व्यक्तियों से अधिक है, जबकि अमेरिका में अधिक से अधिक पचास व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। जाहिर है कि हमें अमेरिका, ब्रिटेन या रूस के औद्योगिक ढांचों का अनुकरण नहीं करना चाहिए था, और न ही करना चाहिए। मशीनीकरण तथा आटोमाइजेशन क्या है? तथा इसके परिणाम कितने खतरनाक हैं? इसे समझना कठिन नहीं। हम देख व समझ सकते हैं कि एक छोटी सी मशीन भी कम से कम पचासों व्यक्तियों के श्रम को लील जाती है, बड़ी मशीनों के बारे में क्या बताना, उसका अनुमान हम लगा सकते हैं। हमारे यहां की बढ़ती बेरोजगारी के लिए मशीनों की उपयागिता को भी एक अनिवार्य कारण मान व जान लेना चाहिए। अगर हमारे सोनभद्र में ही भारी मशीनों के प्रयोग न हो रहे होते या उसके प्रयोग संकुचित होते तो निश्चित रूप से यहां लाखों लोगों को रोजगार मिला होता। एक अनुमान के हिसाब से कम से कम दो तीन लाख लोगों के श्रम का अपमान यहां प्रतिदिन किया जा रहा है, पूरे देश में मानवीय श्रम का कितना अपमान किया जा रहा है, इसकी कल्पना करना रुलाने वाला होगा। सोनभद्र के कथित धनी और सभ्य, चिल्ला चिल्ला कर कह रहे हैं, मशीनें नहीं रहेंगी तो काम कैसे होगा? इतने बड़े-बड़े कारखाने बिना मशीनों के कैसे चलाये जा सकते हैं? हजारों लाखों टन का उत्पादन कैसे होगा? इन सवालों के उत्तर आज शायद किसी के पास नहीं, बुद्धिजीवी भी माथा पकड़ कर बैठे हुए हैं, कोई नहीं सोच रहा, लाखों टन माल का उत्पादन किसके लिए किया जा रहा है? कारखाने तो स्थापित हो गये फिर बेरोजगारों की सेना क्यों बढ़ रही है? अगर बेरोजगारी दूर करनी है, तो कुछ न कुछ तो विचारना ही होगा। मशीनों का उपयोग क्रूरता की हद तक बढ़ता जाये तथा बेरोजगारी भी समाप्त हो जाये दोनों बातें एक दूसरे की विरोधी हैं। आधुनिक समाज को कारखानों के निर्माण की बुनियाद पर जिस तरह खड़ा किया जा रहा है, तथा उसे अधिकतम उत्पादन और अधिकतम लाभ के धागों से बुना जा रहा है, क्या ऐसे समाज में सभी के चेहरों पर हंसियां या जीवन जीते रहने के उमंग आ सकती है? कथित विकास के पैरोकार नारे लगा रहे हैं कि वे प्रकृति के अधिकतम रहस्यों को जानने में सफलता हासिल कर लिए हैं, पर क्या वह लक्ष्य भी हासिल किया जा सका है जो मानव सभ्यता के लिए अनिवार्य था? कम से कम हर आदमी के लिए एक घर हो, उसमें रहने वाला उसका परिवार तथा बच्चे सभी हंसते तथा मुस्कराते हुए हों, वे पढ़ रहे हों तथा स्वस्थ हों, उन्हें कम से कम सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा की तनिक भी चिन्ता न हो, कानूनी एवं राजनैतिक सुरक्षा के प्रति भी वे आश्वस्त हों। कहने को कहा जा रहा है कि आज की सभ्यता ने विज्ञान के सहयोग से जो तकनीकी कौशल हासिल किया है, तथा वैज्ञानिक वुद्धि का जिस प्रकार से प्रदर्शन किया है, वह पहले के जड़-कालों में संभव नहीं हो पाया था। तकनीकी कौशल एवं वैज्ञानिक वुद्धि का अधिकतम उपयोग आज पूरी सभ्यता के सामने किसी मृग-मरीचिका की तरह ही जान पड़ रही है। केवल उसे देखते रहो, किसी देखने वाली अन्य चीजों की तरह, जिसका व्यावहारिक उपयोग कुछ भी नहीं। मशीनीकरण के पैरोकार भी इस सवाल का उत्तर नहीं देते, वे नहीं बताते कि औद्योगीकरण ने कम से कम गरीब और अविकसित आबादी वाले देशों को क्या दिया? आर्थिक, सामाजिक राजनैतिक बराबरी के नारे लगातार पीटे जा रहे हैं, पर क्या हो रहा या क्या किया जा रहा इन नारों के लक्ष्यों को हासिल करने के बाबत? अगर यह मान ही लिया जाये कि बिना मशीनों के उपयोगों के अधिकतम उत्पादन के लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सकता, सामाजिक आवश्यकतायें नहीं पूरी होने वाली, फिर तो अधिकतम उत्पादन करना ही होगा, जिससे सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति संभव बनायी जा सके। ऐसी स्थिति में कहा जा सकता है कि ‘आवश्यकता के अनुसार उत्पादन’ तथा ‘काम के अनुसार दाम’ वाले सिद्धान्त के हम विशेष पक्षधर हैं, फिर भी क्या हमें यह नहीं विचारना चाहिए कि अगर अधिकतम उत्पादन तथा प्रकृति का क्रूरतम दोहन ही हमारा लक्ष्य है, तथा हमारे लक्ष्यों में बढ़ती बेरोजगारी दूर करना केवल मौखिक डाइरिया है, फिर तो आगे क्या कहना और सोचना। अधिकतम उत्पादन के लक्ष्य को सामाजिक विकास का आधार मानकर हमने किसका भला किया, यह भी तो सोचना होगा। कोई भी राजनैतिक ताकत अगर अपनी आर्थिक और राजनीतिक ताकत से भारी मशीनों के प्रयोग को समाज के लिए अनिवार्य बना दे, तथा समाज में बढ़ती बेरोजगारी के प्रति घड़ियाली आंसू बहाये तो उस सरकार को जनविरोधी नहीं कहा जायेगा फिर क्या कहा जायेगा? यह सवाल सरकार की नियति से जुड़ा हुआ है, जिस पर गंभीरता से विचार किये जाने की आवश्यकता है। जाहिर है बेरोजगारी को बढ़ाना यह एक प्रकार से सरकारी समाज-द्रोह ही नहीं, बल्कि राष्ट्र-द्रोह जैसा भी है। हर वह राजनैतिक क्रियाशीलता जिसमें नागरिकांे का सम्मान और प्रतिष्ठा न होे, जो सरकार अपने नागरिकों को काम करने का समान अवसर न उपलब्ध कराये तथा बोझ समझे, निश्चित रूप से वह सरकार समाज-द्रोही है। भारी मशीनों तथा आटोमाइजेशन की जुड़वा डाइनों ने सोनभद्र के विकास को केवल धनिकों को धनी बनाने का काम किया है, आदिवासियों को उनकी जमीनों से विस्थापित करने का काम किया है, कुछ विशेष लोगों को लाभ पहुंचाकर बहुसंख्यक लोगों के काम करने के अधिकारों को छीन लिया है। अन्य बातों एवं अन्य कामों के अलावा हमारे राजनैतिक सत्ता के पास इस तथ्य का उत्तर और समाधान दोनों नहीं है और न ही सरकार इस बात के लिए चिन्तित ही है। किसी भी लोकतांत्रिक राज्यसत्ता को जनता एवं समाज के हितों की सुरक्षा के लिए संवैधानिक रूप से उत्तररदायी होना अनिवार्य है। इस सचाई को शायद ही कोई अस्वीकार करे। बेरोजगारी और भुखमरी चिल्लाते रहने से कुछ नहीं होने वाला, ऐसा तो आजादी के बाद से लगातार चिल्लया जा रहा है, क्या फर्क पड़ा? फर्क तो तब पड़ेगा जब समता-मूलक राजनैतिक प्रबंधन किए जायेंगे तथा बेरोजगार लोगों को बोझ न समझ कर देश का अनिवार्य नागरिक माना जाएगा, उन विशेष सुविधा प्राप्त लोगों की तरह, जिन्हें सत्ता प्रबंधन की चोटी पर बिठाया गया है। बिडंबना यह है कि गरीबी तथा बेरोजगारी की बढ़ोत्तरी को जनसंख्या बृद्धि का परिणाम बहुत ही अनैतिक व निर्लज्ज तरीके से बताया व समझाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि हमारे देश में बढती बेरोजगारी का एक मात्रा कारण है जनसंख्या की बढ़ोत्तरी। पर ऐसा नहीं है, जनसंख्या की बढ़ोत्तरी तो ठीक उसी तरह से है जिस तरह एक पिता अपने पुत्रों की संख्या देखकर आत्म-हत्या कर ले, अधिक बच्चे हो गये, या फिर पुत्रों की हत्या कराये जिससे उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर न होने पाये। कम से कम हिन्दुस्तान का बाप ऐसा नहीं करेगा, वह सभी पुत्रों के लिए सोचेगा तथा हर संभव प्रयत्न करेगा कि उसके पुत्रा आत्म-निर्भरता हासिल कर सकें। असल कारण तो बताया नहीं जा रहा, असल कारण है कि देश की सारी प्राकृतिक तथा मौद्रिक संपदा आज के समय में मुश्किल से दस फीसदी से कम लोगों के हाथों में है और नब्बे फीसदी लोग तो संपदा व संपत्ति के अधिकारों से विहीन, केवल नागरिक भर हैं। किसे नहीं पता कि केवल नागरिक हो जाने से नागरिक के संपूर्ण अधिकारों का उपयोग करना नहीं होता। कहा जाता है कि हमारे देश में नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए जितने कानून हैं, शायद ही उतने कानून किसी लोकतांत्रिक देश में हों। हमारे यहां जो बाधा महसूस की जा रही है, वह है नागरिक अधिकारों के जनहितकारी क्रियान्वयन में कमजोरी की, कोई ऐसा जन-समूह नहीं है, जो इस कमी को महसूस नहीं कर रहा हो। सरकारी स्तर पर लगातार घोषणायें की जा रही हैं कि नागरिकों के विधिक अधिकारों के क्रियान्वयन में, किसी भी प्रकार की कोताही नहीं की जाएगी पर लगातार उल्टा हो रहा है। सरकारें कानूनों के अधिकतम क्रियान्वयन की इच्छाशक्ति का प्रदर्शन नहीं कर पा रहीं, उनका नियंत्राण कानूनों के अनुपालन कराने के बारे में लगातार छीजता तथा सिकुड़ता जा रहा है। बेरोजगारी के सवाल पर अगर बात की जाये तो साफ जाहिर है कि बेरोजगारी, बेरोजगारी चिल्लाने से कुछ नहीं होने वाला, कुछ तो तब होगा जब हम मानव प्रतिष्ठा को कानूनी, सामाजिक एवं नैतिक रूप से सम्मानित करना सीखेंगे,अपनी अन्तर्दृष्ष्टि को करूणा, दया, प्रेम सद्भाव, सहिष्णुता जैसे प्राकृतिक गुणों से सजाएंगे। मेरा मानना है कि सरकारों का भी व्यक्तित्व होता है, एक आदमी की तरह, उसमें भी वही प्रशंसनीय गुण होने चाहिए जो व्यक्ति में होने चाहिए। किसी लोकतांत्रिक सरकार के गुणों की पहचान करना आसान नहीं, सामान्य रूप से समझा जा सकता है कि जो सरकार अपने नागरिकोें के अपमान पर खामोश हो, सत्ता-प्रबंधन पर व्यक्त किये जाने वाली असहमतियों को राष्ट्रद्रोह मानती हो, जो बढ़ती बेरोजगारी को जनसख्या विस्फोट की संज्ञा से संबोधित करती हो, अभिव्यक्ति को अवमानना का आधार मानती हो, तथा अपने नागरिकों की संप्रभुता को खंडित करने वाले उन्हीं दण्ड-विधानों का अनुमोदन करती हो जो मानवीय अपमान के जनक हों। जाहिर है हमारे यहां प्रचलित दण्ड-विधान के सारे कानून तब अधिनियमित किए गये थे जब अंग्रेजी सरकार थी तथा भारत की जनता को गुलाम मानती थी। हमें निश्चित रूप से अंग्रेजी कानूनों के अधिनियमन पर इस आशय से विचार करना चाहिए कि वे कानून क्यों तथा किस लक्ष्य के लिए बनाये गये थे। किसे नहीं पता कि अंग्रेज कथित नादिरश्शाह से कम लुटेरे नहीं थे, उनमें इतना ही फर्क था कि वे लूट करने के लिए भी कानून बना लिया करते थे। गैरबराबरी तो तभी दूर हो सकती है जब सरल एवं सामान्य रूप से सभी को बराबरी के अवसर हासिल हों, प्रतियोगिता की सीमायें बांधी जायंे पर ऐसा नहीं हो रहा? आज तो हर मोड़ पर कथित प्रतियोगिता को सम्मानित ही नहीं प्रशंसित भी किया जा रहा है, और कहा जा रहा है कि प्रतियोगिता तो सभी को समान अवसर देती ही है। दुनिया जानती है कि प्रतियोगिता चाहे चुनाव में हो, अधिकारियों के चयन में हो, सरकारी नेटवर्क बनाने में हो, कहीं भी अपनी नैतिकता को तथा जनता के प्रति समर्पण को, प्रमाणित नहीं कर पा रही है। प्रमाणित कर भी नहीं सकती, क्योंकि प्रतियोगिता के आधार ही भारतीय समाज में अप्राकृतिक हैं। किसे नहीं मालूम आर्थिक एवं समाजिक रूप से गैरबराबरी वाले समाज में आर्थिक रूप से कमजोरों के लिए अगर विशेष अवसर के सिद्धान्त को लागू नहीं किया जा रहा, तथा प्रतियोगिता के नियमों में शिथिलता नहीं दी जा रही फिर प्रतियोगिता जनसमान्य के लिए किस काम की? प्रतियोगिता के लिए जिस विशेष ज्ञान व शिक्षा को मानक के तौर पर आधार बनाया गया है, या बनाया जाता है, क्या वह ज्ञान तथा विशेष शिक्षा के अवसर सभी को हासिल हो सकते हैं? या हैं? आज तो हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था तथा शिक्षा हासिल करने के अवसर दोनों ही भयानक रूप से असमान हैं। नर्सरी स्कूल चल रहे हैं, बच्चे विदेशों में जा कर पढ़ रहे हैं, बिडंबना है कि गरीबों के बच्चों के लिए उपलब्ध प्राथमिक पाठशालायें अव्यवस्था की शिकार हैं। किसी भी समाज को विकसित तब कहा जा सकता है जिस समाज में गैरबराबरी का अनुपात काफी कम हो, यह तो माना जा सकता है कि प्राकृतिक रूप से भी हर व्यक्ति समान नहीं हो सकता, पर विशेष अवसर प्रदान कर सभी को बराबरी के स्तर पर तो लाया जा सकता है। आज ऐसा देखा भी जा रहा है। अगर हम उत्तर प्रदेश की बात करें तो हम देख रहे हैं कि विशेष अवसर के कारण ही प्रदेश की मुख्य मंत्राी एक दलित महिला हो चुकी हैं। ऐसा हम विगत दस वर्षों से देख रहे हैं कि बदलाव आ रहे हैं, बहुत सारे दलित व पिछड़े राजनीति व सरकारी नौकरियों में अपनी पहचान बना रहे हैं, अगर दलितों व शोषितों को विशेष अवसर ईमानदारी से उपलब्ध कराये जाते हैं तो अभी और बदलाव होंगे। पीछे देखू विचारक गैर बराबरी को जंनसंख्या वृद्धि का कारण मानते हैं, तथा तर्क देते हैं कि असमानता इसी कारण से है, पर वे नहीं विचारते कि जनसंख्या वृद्धि तो हमारी उपलब्धि है। जनसंख्या में और वृद्धि न हो, इसके लिए प्रयास किए जाने चाहिए पर उसी पर दोष देना गलत है। हमें वे तरीके नहीं मालूम या हम उन तरीकों को खोजना ही नहीं चाहते जिससे जनसंख्या को सम्मानित किया जा सके। जनसंख्या को बेरोजगारी का कारण हमें तो तब मानना चाहिए था जब हम सभी को काम करने का अवसर उपलब्ध कराते, संसाधनों के उपयोग में भागीदारी देते, हमने ऐसा कब किया? आज हमारे देश में मतदान का औसत ग्राम प्रधानों के चुनावों में नब्बे प्रतिशत से ऊपर जा रहा है, आखिर ऐसा अवसर के कारण ही तो हो रहा है, पहले काम का अवसर उपलब्ध कराओ, प्राकृतिक संसाधनों में भागीदारी दो, फिर सोचो गड़बड़ी कहां है? जिस समाज की बहुसंख्यक जनता के पास काम करने के अवसर ही न हों तथा उनकी असीमित क्षमता एवं ऊर्जा का जनहित में उपयोग ही न किया जा रहा हो, वह तो सोनभद्र की तरह अविकसित रहेगा ही? यहां के कुछ फीसदी लोगों का विकास हुआ है, पर बहुसंख्यकों का नहीं। आज भी 40 फीसदी से अधिक गरीब यहां बसते हैं और बेरोजगार तो लगभग 80 फीसदी के आस-पास हैं। यहां जोत की अधिकतम भूमि प्रति-व्यक्ति आधे एकड़ से कम है, जबकि जंगल भूमि 57 प्रतिशत है और मजा यह कि करीब 30 प्रतिशत से अधिक वन-भूमि पर एक भी पेड़ नहीं हैं, उसे समतल करके कृषि योग्य बनाया जा सकता है। बिडंबना है कि औद्योगिक विकास के बावजूद सोनभद्र काफी पिछड़ा हुआ परिक्षेत्रा है। इस कथित औद्योगिक विकास ने सोनभद्र को दिया कुछ भी नहीं, लील लिया सारा कुछ। सोनभद्र कृषि उत्पादन वाला परिक्षेत्रा है, आदिवासियों का परिक्षेत्रा है, आदिवासी कारखानों में ठेका मजूरी करने, भीख मांगने, या वन-विभाग में पेड़ लगाने के लिए अभिशप्त हैं। उनकी जमीनें या तो कारखानों ने छीन लिए हैं या वन-विभाग ने। तो यह है एक आदिवासी जनपद सोनभद्र की तस्वीर, उस जनपद की तस्वीर जिसके मालिक व राजा कभी यहां के आदिवासी हुआ करते थे। यह है सोनभद्र जनपद जिसे कानून ने ही संविधान की अनुसूची पांच में शामिल नहीं होने दिया, यहां के मूल निवासी आदिवासियों को अनुसूचित जाति में तब्दील कर दिया गया। इस सोनभद्र के आदिवासी, दलित, भूमिहीन मुस्कराते हुए अपने होने को कब तक प्रमाणित कर पायेंगेे कुछ नहीं कहा जा सकता। पर यह सच है कि औद्योगिक प्रगति की प्रतीक चिमनियों ने यहां के मूल निवासियों को दिया कुछ नहीं है बल्कि उनका सारा कुछ हड़प लिया है। कारखानों की अवस्थापनाओं को आधुनिक दुनिया की बढ़ रही आर्थिक चुनौतियों के कारण खारिज तो नहींे किया जा सकता पर उसे लोकोपायोगी बनाया जा सकता है। कारखानों की अवस्थापनाओं को छोटे-छोटे संभावित टुकड़ों में बांट कर उसे ग्राम केन्द्रित उद्योगों की शक्ल में स्थापित कराया जा सकता है। देखना होगा कि एक विशाल-काय करखाने को कितने टुकड़ों में सहजता से बाटा जा सकता है और विभक्त टुकड़ों को कैसे गॉवों में स्थापित कराया जा सकता है। सत्ता के विकेन्द्रीकरण का फार्मूला ग्राम-पंचायतों की तरह औद्योगिक इकाइयों पर भी लागू करना होगा और बड़े उद्योगों की विकेन्द्रित व्यवस्था पर बल देना होगा। ऐसा करना असंभव इसलिए नहीं है कि हर बड़े का


रखाने भले ही एक परिक्षेत्र में स्थापित होते हैं फिर भी उनके काम अलग अलग टुकड़ों में अलग अलग किए और कराये भी जाते हैं। सोनभद्र के लगभग सभी कारखानों में सारे काम अलग अलग टुकड़ों में कराये जाते हैं हालांकि कारखाने का परिक्षेत्रा एक ही होता है। दुखद है कि हमारे देश में कारखानों के मालिक ही अपने कारखाने का प्लान बनाते हैं और उत्पादन करते हैं, उत्पादन के लिए बड़ी रियायतों पर कच्चा माल भी सरकार से हासिल कर लेते हैं। कच्चे माल की तो हालत यह है कि वे पानी और हवा दोनों का मूल्य ही नहीं देते और पर्यावरण की क्षति अलग से करते हैं। कच्चे माल के लिए हजारों एकड़ भूमि नाम मात्रा के राजस्व पर हासिल कर लेते हैं। हमारे देश की दिक्कत यह है कि हमारे उद्योग मालिक केन्द्रत होते हैं, वे ही प्रस्ताव लाते हैं, वे ही बनाते हैं और चलाते भी हैं। सरकार उन्हें केवल मंजूरी देने का काम करती है। उद्योगों की स्थापनाओं के लिए सुझाव व सलाह देने वाली कोई सरकारी संस्था नहीं, सरकार नहीं विचारती कि भारी जनसंख्या वाले हमारे देश में ग्राम-केन्द्रित किस तरह के उद्योग-धन्धे स्थापित कराये जाने चाहिए सो चिमनियों का मालिक मस्त मस्त होता है और अपने लाभ वाले कारखानों को स्थापित करता करवाता है। तो यह तस्वीर है हमारे जनपद की, आप रोयें या हसें।

Comments

  1. यह असाध्य कार्य चुपचाप आप ही कर सकते हैं। शुभकामनाएं।

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    1. धन्यवाद सोहेल भाई कैसे हैं फुर्सत में फोन तो करें

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    2. यह अंक और बाकी पहले के दोनों अंक कैसे प्राप्त करें सर?

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